संसद में पीएम मोदी का बयान और अचानक पैदा हुआ तूफान
लोकसभा की कार्यवाही सोमवार को सामान्य ढंग से चल रही थी, लेकिन तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर बोलना शुरू किया। उनका पहला ही वाक्य राजनीतिक माहौल को गरम कर देने वाला था।
मोदी ने कहा— “वंदे मातरम पहले बंटा, फिर देश बंटा।”
सदन में बैठे कई सांसद एक-दूसरे को देखने लगे। कांग्रेस बेंच पर बेचैनी बढ़ी। बीजेपी सांसद मेजें थपथपाने लगे। इस एक लाइन ने पूरे माहौल को बदल दिया।
पीएम ने आरोप लगाया कि 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में वंदे मातरम के महत्वपूर्ण छंद हटा दिए, ताकि मुसलमानों को नाराज़ न किया जाए।
तुरंत विपक्ष खड़ा हो गया। प्रियंका गांधी ने तंज कसते हुए कहा—
“भारत की आत्मा के महामंत्र को विवाद में घसीटना पाप है।”
यह बयान संसद से बाहर निकलते ही सोशल मीडिया पर आग बन गया। #VandeMataram150 कुछ ही मिनटों में देशभर में ट्रेंड करने लगा। शाम तक यह हैशटैग 10 लाख से ज्यादा पोस्ट पार कर चुका था।

150 साल पुरानी कहानी फिर क्यों चर्चा में आई?
वंदे मातरम का जन्म 1875 में हुआ था, लेकिन यह केवल साहित्यिक रचना नहीं है—यह एक आंदोलन की आवाज है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनंदमठ’ उपन्यास में इसे शामिल किया था। उस दौर में ब्रिटिश शासन अपनी पहचान थोप रहा था। ऐसे में ‘वंदे मातरम’ लोगों के दिल में आज़ादी की आग जगाने लगा।
कांग्रेस के शुरुआती अधिवेशनों में यह गीत गूंजा। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में इसे बार-बार गाया गया।
1905 के बंगाल विभाजन विरोध प्रदर्शनों में लाखों लोग वंदे मातरम गाते हुए सड़कों पर उतरे। अंग्रेज़ इस गीत के प्रभाव से घबराने लगे थे।
लेकिन 1937 में मामला पलट गया।
1937: वह साल जब गीत का ‘विवाद’ जन्मा
1937 प्रांतीय सरकारों के गठन का समय था। इसी दौरान मुस्लिम लीग ने गीत के कुछ हिस्सों को ‘इस्लाम विरोधी’ बताते हुए कड़ा विरोध जताया।
आपत्ति का कारण था—गीत के बाद के छंदों में देवी-देवताओं का उल्लेख।
कांग्रेस वर्किंग कमेटी असमंजस में थी।
गांधी ने कहा कि धार्मिक विवाद टालने के लिए समाधान निकाला जाए।
रवींद्रनाथ टैगोर ने सलाह दी कि गीत के पहले दो छंद ही सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए अपनाए जाएं।
नेहरू ने इस साथ सहमति जताई।
आखिरकार फैसला हुआ—
केवल पहले दो छंद अपनाए जाएंगे।
नेताजी सुभाष बोस ने इसका विरोध किया था। उनका मानना था कि पूरा गीत राष्ट्र की चेतना को दर्शाता है।
यहीं से शुरू हुई वह बहस, जो 2025 में फिर संसद के अंदर दोबारा गूंज रही है।
मोदी का दावा—नेहरू जिन्नाह के दबाव में झुक गए थे
संसद में पीएम मोदी ने नेहरू के एक कथित पत्र का उल्लेख किया, जिसमें नेहरू ने बोस को लिखा था कि वंदे मातरम ‘कुछ समुदायों को भड़का सकता है’।
मोदी ने कहा—
“जिन्नाह विरोध कर रहे थे, और नेहरू सहमत हो गए। गाना पहले टूटा, देश बाद में।”
बीजेपी सांसदों ने इसे ऐतिहासिक गलती बताते हुए पूरा गीत गाने की मांग की।
कांग्रेस ने जोरदार विरोध किया। प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी ने “नेहरू के पत्र को आधा पढ़कर” भ्रामक प्रचार किया।
उनका कहना था कि नेहरू ने बोस को पूरा गीत गाने की स्वतंत्रता दी थी, लेकिन साथ ही देश की एकता बनाए रखने की अपील की थी।
संसद का वातावरण कुछ समय के लिए काबू में ही नहीं रहा।
इमरजेंसी का जिक्र और विवाद की एक नई परत
मोदी ने एक और बयान दिया जिसने विपक्ष को आक्रामक बना दिया—
“100 साल पर इमरजेंसी ने गीत की आवाज दबाई।”
कांग्रेस ने तुरंत पलटवार किया कि इमरजेंसी में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था।
बीजेपी ने कहा कि उस दौर में कई सांस्कृतिक प्रतीकों को सत्तावादी रवैये से दबाया गया।
सोशल मीडिया पर दो कैंप—‘पूरा गाओ’ बनाम ‘एकता पहले’
जैसे ही पीएम का भाषण खत्म हुआ, सोशल मीडिया पर मीम्स, वीडियो, ऐतिहासिक स्क्रीनशॉट्स और लंबी-लंबी थ्रेड्स छा गईं।
#VandeMataram150 के अंतर्गत देशभर में दो स्पष्ट धड़े दिखाई देने लगे।
समर्थक कह रहे हैं:
- वंदे मातरम को पूरा सम्मान मिलना चाहिए।
- छंद काटना ऐतिहासिक भूल थी।
- 150 साल पर पूरा गीत गाया जाए।
विरोधी कह रहे हैं:
- एकता देश की सबसे बड़ी ताकत है।
- किसी भी समुदाय को असहज न होने दिया जाए।
- आधे छंद गाने का फैसला ऐतिहासिक तौर पर सही था।
सरकारी कार्यक्रम—क्यों हो रहा इतना बड़ा सेलिब्रेशन?
मोदी सरकार ने वंदे मातरम 150 वर्ष पूरे होने पर पूरे वर्ष का सांस्कृतिक उत्सव शुरू किया है।
‘vandemataram150.in’ पोर्टल पर देशभर के लोगों की आवाज रिकॉर्ड की जा रही है।
लक्ष्य— 5 करोड़ लोग वंदे मातरम गाकर अपलोड करें।
इसके साथ:
- MyGov पर क्विज
- स्कूल-कॉलेजों में कार्यक्रम
- OTT पर स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस की बायोपिक
- क्षेत्रीय भाषाओं में वंदे मातरम रेंडिशन्स
विशेष रूप से बंगाली और तमिल संस्करण ट्रेंड कर रहे हैं।
विपक्ष का आरोप—बंगाल चुनाव 2025 का एजेंडा
विपक्ष का दावा है कि बीजेपी यह मुद्दा बंगाल चुनाव 2025 को देखते हुए उठा रही है।
टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने मोदी को टोका—
“बंकिम चंद्र को बंकिम दा मत कहिए। बंगाल में हम उन्हें बंकिम बाबू कहते हैं।”
टीएमसी ने कहा कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी।
बीजेपी ने जवाब दिया कि वंदे मातरम राष्ट्रीय गान के समान सम्मान का पात्र है।
राजनीतिक जोड़तोड़—कौन क्या हासिल करना चाहता है?
विश्लेषकों के अनुसार, इस विवाद के कई राजनीतिक आयाम हैं।
बीजेपी का लाभ:
- राष्ट्रवाद का बड़ा मुद्दा
- 2025 के बंगाल चुनाव में सांस्कृतिक कार्ड
- कांग्रेस पर appeasement का आरोप
कांग्रेस की रणनीति:
- नेहरू की छवि बचाना
- मुद्दे को “धर्म बनाम एकता” की बहस में बदलना
- बीजेपी पर ‘इतिहास तोड़ने-मोड़ने’ का आरोप
टीएमसी का लक्ष्य:
- बंगाल की संस्कृति की रक्षा
- बंगाल बनाम दिल्ली की भावना को मजबूत करना
यानी यह विवाद केवल गीत का नहीं—यह 2025 की राजनीति का केंद्र बन चुका है।

सोशल मीडिया डेटा—विवाद कितना बड़ा?
डिजिटल ट्रेंड विश्लेषण के अनुसार:
- 30% पोस्ट इतिहास से जुड़े थे
- 25% बंगाल चुनाव पर केंद्रित
- 20% मोदी-कांग्रेस टकराव पर
- 15% मीम्स
- 10% धार्मिक बहसें
साफ है कि वंदे मातरम 150 विवाद 2025 अब पूरी तरह जनभावनाओं से जुड़ चुका है।
क्या ‘पूर्ण बनाम आधा’ बहस देश को जोड़ेगी या और बांटेगी?
सवाल यही है—क्या यह विवाद भारत की एकता को मजबूत करेगा या नई दरारें पैदा करेगा?
पूरा गीत गाने वाले कहते हैं:
- यह राष्ट्र का मंत्र है
- विभाजनकारी फैसलों को सुधारना चाहिए
- 150 साल का मौका ऐतिहासिक है
पहले दो छंद समर्थक कहते हैं:
- सभी धर्मों की भावना का सम्मान ज़रूरी
- यह फैसला स्वतंत्रता सेनानियों की सहमति से हुआ था
- विवाद बढ़ाना नई राजनीतिक चाल है
दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं।
लेकिन इतना तय है—वंदे मातरम जैसा गीत आज भी भावनाओं को झकझोर देता है।
2025 के लिए बड़ा प्रश्न—गीत पर राजनीति या राजनीति पर गीत?
इतिहास के पन्नों में वंदे मातरम एक सांस्कृतिक धरोहर है।
लेकिन 2025 में यह राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
पीएम मोदी के बयान ने एक पुराना मुद्दा फिर से जगा दिया है—इतिहास की व्याख्या किसकी सही है?
कांग्रेस नेहरू की मंशा को “एकता के लिए सही निर्णय” मानती है।
बीजेपी इसे “तुष्टिकरण की गलती” कहती है।
अगले कुछ महीनों में यह बहस और तेज होगी—
क्योंकि यह सिर्फ गीत का सवाल नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान का मुद्दा बन चुका है।
150 साल पुराना गीत, लेकिन बहस आज भी उतनी ही गर्म
वंदे मातरम 150 वर्षों की यात्रा में कई दौरों से गुजरा—प्रेरणा, प्रतिरोध, राजनीति और अब डिजिटल युग की बहस।
पीएम मोदी के बयान ने एक पुरानी बहस को नए अंदाज़ में देश के सामने खड़ा कर दिया है।
देश यह सोच रहा है—
क्या वंदे मातरम का सम्मान उसके संपूर्ण रूप में है,
या उसकी भावना को जीवित रखना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है?
विवाद चाहे जो हो,
लेकिन एक बात साफ है—
वंदे मातरम आज भी भारत की धड़कन में उतना ही जिंदा है जितना 1905 या 1947 में था।